ऑख के तारे
नमस्कार
जय श्री कृष्णा , आज अपनी इस कविता कोश Parasnath Poetry के माध्यम से अपनी रचना "ऑख के तारे " प्रदर्शित करता हूं यह कविता बच्चों की भावना को समझने व उनके हित के लिए उन्हें न्याय पथ पर निरंतर आगे बढ़ने में सहयोग कैसे करें यह कविता इन्हीं पहलुओं को प्रकाशित करने के उद्देश्य से ,आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं
बच्चे तो मन के सच्चे है
उनके मन मे वैर कहां
है वैर अगर जुबां पर उनकी
तो, उनके जैसा मासुम कहां
बागो का यह अनमोल रतन
अरमानो का जिनमे अम्बार भरा
है आनंदमय हर संघ जिनसे
उल्लासो मे हर पल भरा
न वैर किसी से, न गैर किसी का
अपनापन का है एक साज जहां
है प्रेम भरा मठ संगम का, ऐसा
सदभावो का विस्तार कहां
न अहम उनमे, न तुम उनमे
न तेरा मेरा का वास भरा
है वासना बस इतना उनमे
ज्यो तुम चला त्यो मै चला
चल पड़े उन पग पर भी, जहां
आकलन न कोई अवलोकन है
है मान अगर उनके इरादो का
ना भी हां मे सफल कर आता है
है मनन करने की सबल जहां
क्यों ना, उस तलब मे रसदान करे
शांतिमय का संचार रख
क्यों ना, पुर्ण प्राप्ति का रसपान करे
बच्चे तो मन के सच्चे है
उनके मन मे वैर कहां
है वैर अगर जुबां पर उनकी
तो, उनके जैसा मासुम कहां
बच्चे तो मन के सच्चे है ...।.
"है प्रबल जो हर परिभाषा मे
भरा वास जिनमे अरमानो का
है रचनाकार वही जग मे
स्वरुप जङा जिनमे सदभावो का"
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Your Author -पारसनाथ
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